नकलची कौआ

नकलची कौआ



एक पहाड़ की ऊँची चोटी पर गरूड़ रहता था। पहाड़ की तलहटी में एक बड़ा पेड़ था। पेड़ पर एक कौआ अपना घोंसला बनाकर रहता था। एक दिन तलहटी में कुछ भेंडे़ घास चर रही थीं। गरूड़ की नजर एक मेमने पर पड़ी। वह पहाड़ की चोटी से उड़ा। तलहटी में आकर मेमने पर झपट्टा मारा। उसे चंगुल में लेकर उड़ते हुए वह फिर घोंसले में लौट गया।

गरूड़ का यह पराक्रम देखकर कौए को भी जोश आ गया। उसने सोचा, "यदि गरूड़ ऐसा पराक्रम कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं कर सकता?"



दूसरे दिन कौए ने भी एक मेमने को तलहटी में चरते हुए देखा। उसने भी उड़ान भरी और आसमान में जितना ऊपर तक जा सकता था, उड़ता चला गया। फिर उसने मेमने को पकड़ने के लिए गरूड़ की तरह जोर से झपट्टा मारा। मगर मेमने तक पहुँचने की बजाय वह एक चट्टान से जा टकराया। उसका सिर फूट गया, चोंच टूट गई और उसके प्राण-पखेरू उड़ गए।



शिक्षा -बिना सोचे-समझे किसी की नकल करने से बुरा हाल होता है।

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