सुगंध और खनखनाहट

सुगंध और खनखनाहट



एक गरीब मजदूर था। वह खेतो में काम करता था एक दिन शाम को वह अपना काम खत्म करके घर लौट रहा था रास्ते के किनारे मिठाई की एक दुकान थी। मिठाईयो की मीठी मीठी सुगंध रास्ते भर आ रही थी। इससे मजदूर के मुह में पानी आ गया। वह दुकान के पास गया। कुछ देर वहाँ खड़ा रहा उसके पास थोड़े पैसे थे। पर वे मिठाई खरीदने के लिये काफी नही थे। वह खाली हाथ लौटने लगा तभी उसे दुकनदार की कर्कश आवाज सुनाई दी। "रूको! पैसे तो देते जाओ।"



पैसे ? काहे के पैसे? मजदूर ने पूछा?



मिठाई के और काहे के! दुकनदार ने कहा,



"पर मैने तो मिठाई खाई नही! उसने जवाब दिया।



"लेकिन तुमने मिठाई की सुगंध तो ली है न!" दुकनदार ने कहा, "सुगंध लेना मिठाई खाने के बराबर है।"



बेचारा मजदूर घबरा गया। वहाँ खड़ा एक होशियार आदमी यह सुन रहा था। उसने मजदूर को अपने पास बुलाया उसके कान में फुसफुसाकर कुछ कहा। उस आदमी की बात सुनकर मजदूर का चेहरा खिल उठा वह दुकनदार के पास गया और अपनी जेब के पैसे खनखनाने लगा पैसो की खनखनाहट सुनकर दुकनदार खुश हो गया। चलो निकालो पैसे। मजदूर ने कहा, "पैसे तो मैने चुकता कर दिए"



दुकनदार ने कहा, "अरे तुमने पैसे कब दिए?"



मजदूर ने कहा, "तुमने पैसो की खनखनाहट नही सुनी अगर मिठाई की सुगंध लेना मिठाई खाने के बराबर है। तो पैसो की खनखनाहट सुनना पैसे लेने के बराबर है।" हा हा हा वह गर्व से सर ऊँचा किए कुछ देर वहाँ खड़ा रहा। फिर मुस्कराता हुआ चला गया।



शिक्षा -जैसे को तैसा

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